चेतना का भार
देह जब भारी लगने लगे, तब सबसे पहले मन उस भार को पहचानता है —
पर ये भार क्या सचमुच शरीर का होता है?
या चेतना का?
एक दोपहर सुस्त कमरे में स्वयं को सुलाने के प्रयास में, मैंने देखा कि नींद इतनी बोझिल भी हो सकती है —
कमरे में दीवारें उतनी ही थीं, हवा उतनी ही, पर समय का कोई हिस्सा ठहर गया था —
जैसे किसी पुरानी पेंटिंग में जीवन कैद हो गया हो।
मैंने दवाइयाँ लीं, सिर का भारीपन हल्का करने को,
पर देह हवा हो गई।
हवा — जिसका कोई वज़न नहीं होता,
लेकिन वह हर चीज़ में भर जाती है —
जैसे स्मृतियाँ नसों में भर जाती हैं।
रात को जब हाथ गाल के नीचे रखा,
तो लगा — यह हाथ मेरा नहीं है।
या शायद मैं ही देह नहीं हूँ।

विज्ञान जिसे ‘नर्वस सिस्टम’ कहता है ,
वह इस क्षण में एक दर्शन बन गया था —
क्योंकि यह जान पाना मुश्किल हो गया था कि
हाथ दिमाग़ को महसूस कर रहा है या दिमाग़ हाथ को।
मुझे लगा चेतना का कोई कोना है जहाँ स्पर्श और विचार एक हो जाते हैं —
जहाँ देह की सीमाएँ मिटने लगती हैं।
जहाँ हम अपने भीतर बसी आत्मा को हवा की तरह महसूस करते हैं —
अलक्षित, अदृश्य, और फिर भी सम्पूर्ण।
कभी–कभी देह और मन एक–दूसरे की भाषा भूल जाते हैं।
वहाँ भार नहीं होता —
बल्कि एक ऐसा अनुभव होता है जिसे नाम देना संभव नहीं।
बस इतना लगता है कि कोई पुरानी स्मृति मांसपेशियों में घर कर चुकी है —
और जब थकान आती है,
वह भी साथ–साथ जाग जाती है।
मुझे समझ में आने लगा है कि चेतना एक संवाद है —
देह से, मन से, और स्मृति से।
और जब यह संवाद टूटता है,
तब हम भार महसूस करते हैं।
लेखक ~ शुभ गौरी
Nicely written,great