“वो अभी भी मेरे कमरे में है ,मेरे बगल में बैठती है ,और मैं उसे हर शाम एक गुलाब देता हूँ।”- इमरोज
(लेख : शुभगौरी)
कुछ दिनों पहले एक किताब पढ़ रही थी , वो किताब कम और रंगों से भरा एक कैनवास ज़्यादा लग रहा था । उसमे लिखे शब्द कोई कविता नहीं रच रहे थे बल्कि कैनवास पर सजी धजी बैठी कोई स्त्री अपना जीवन रच रही थी। वो स्त्री ढल चुकी थी लेकिन रंगों की छुअन से वो फिर से जवां गुलाब सी खिल उठी थी।
उन कविताओं में उसके चेहरे पर आए दुख, आँसू बनने से पहले ही चित्रकार ने बारिश बना दिए , और उस बारिश में वो ढली हुई स्त्री बिजली जैसी चमकने लगी।
मैं शब्दों में चित्रों को पढ़ रही थी तभी किसी ने मुझसे पूछा कि मैं कौनसी किताब पढ़ रही हूँ— मैंने किताब उसके हाथों में थमा दी—“मनचाहा ही रिश्ता- इमरोज़”
उस किताब से शुरुआती कुछ कविताएँ पढ़ने के बाद उसने मुझसे कहा -“ये क्या लिखा है, लेखक ऐसा तो नहीं लिखते !”
मैंने कहा “वो लेखक है भी नहीं, वो प्रेमी है..एक रंगसाज प्रेमी, और यहाँ उसने शब्द नहीं लिखे, बल्कि रंग भरे हैं- अपनी अमृता के जीवन में।”
ये किताब एक रंगसाज़ प्रेमी की तरफ़ से अपनी लेखक प्रेमिका के लिए लिखी गई है।
इमरोज़ के प्रेम में प्रयोगों की सम्भावनाएँ थीं-इसलिए उसने हर तरह से अमृता के लिए वो सब किया जिससे कि उसके प्रेम को भी उसके बनाए चित्रों तरह सार्थकता मिले।
अमृता के प्रेम में ठहराव था —वही ठहराव जो ढलती साँझ में होता है, इसलिए तो उसने इमरोज़ से मिलते ही कहा—“अजनबी तुम मुझे ज़िन्दगी की शाम में क्यों मिले,मिलना ही था तो दोपहर में मिलते।”
तब इमरोज़ ने कहा था “मैं तुम्हारा साँझ ही सही लेकिन तुम मेरे लिए मेरे आठों पहर हो।

अमृता इमरोज़ कोई प्रेम कहानी नहीं हैं—वो प्रेम की साधना हैं,उन्होंने प्रेम को साधा और प्रेम की असल परिभाषा के साधक बने। उन दोनों का प्रेम ये बताता हैं कि किसी का साथ पा लेना असल में क्या होता है।
अमृता शब्द-शब्द बिखरती रही और इमरोज़ हर बार उसे अपने रंगों में सहेजता रहा।
“क्या इमरोज़ तुम्हें प्रेम करता है ?” ज़वाब में अमृता कहती थी कि-
“वो तो मेरा साया है ,और साया कभी जुदा नहीं होता”
इमरोज़ ने कभी अमृता से कुछ नहीं चाहा, सिर्फ़ अमृता को चाहा,अमृता के पास होने हो चाहा-अमृता के साथ होने को चाहा। अमृता की थकी आँखों को आधी रात में चाय की महक से ताजा किया, लिख कर सुकून से सोती हुई अमृता की नींदो की रखवाली की।
दोनों अपनी-अपनी तरह से दुनिया से विरक्त थे, एक अपना सब कुछ लुटा कर विरक्त थी तो दूसरा अपना सब कुछ पा कर विरक्त था। दोनों ने कभी भी दुनिया की बनाई रस्मों की परवाह नहीं की , क्यूंकि दोनों जानते थे कि यहाँ आना जाना लगा ही रहेगा , कभी इमरोज़ अमृता बन कर तो कभी किसी और नाम और रूप के साथ।
जब अमृता ने अपनी देह छोड़ी तब इमरोज़ ने शोक नहीं मनाया
इमरोज़ ने कहा-“वो अभी भी मेरे कमरे में है ,मेरे बगल में बैठती है ,और मैं उसे हर शाम एक गुलाब देता हूँ। अब भी मैं रोज़ उसके कमरे में जाता हूँ, उसकी किताबों को छूता हूँ, उसके कपड़े तह करता हूँ, और रात को उसी तकिए पर सिर रख कर सोता हूँ जहाँ कभी अमृता अपने सपनों को रखती थी। अमृता गई नहीं है, वो बस किताब के आख़िरी पन्ने पर चली गई है। अब हर बार जब मैं पढ़ता हूँ , तो वो वहीं मिलती है, एक नया शब्द लेकर…एक नया इश्क़ बनकर।”
इमरोज़ ने कभी भी अमृता की देह से नहीं बल्कि अमृता के भीतर की तीव्र चेतना को प्रेम किया।
सबसे प्यारी बात मालूम है क्या है ? अच्छा ठीक है पढ़ ही लो वो प्यारी बात —इमरोज़ की किताब “मनचाहा ही रिश्ता” से एक नज़्म ..

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चाहत (इमरोज़)
वो भी एक कवि थी
और उसका दोस्त भी एक शायर था
वह आप भी एक शहर में रहती थी
और उसका दोस्त भी 900 मील दूर
एक शहर में रहता था।
कभी-कभी मिलते थे
जब कभी कोई मौका मिल जाता
मुशायरा ही एक मौका हो जाता और
आप वो कभी मौका नहीं बन सके एक दूसरे को मिलने का
एक दूसरे पर नज़्में लिख-लिख कर मिलते रहे
इसी तरह ही मिलते रहे कोई 20 साल…
मुहब्बत ज़िंदगी भी होती है
सिर्फ कविता या नज़्म नहीं…
उसका दोस्त जब कभी उसके शहर आता
उसके पास होता वो और ही हो जाता।
जैसे वो उसी के शहर का हो
उसी की धरती की कोई नज़्म हो, खुशबू हो…
पर अपने शहर जाकर फिर कोई और हो जाता
चुप हो जाता, भूल जाता जैसे कभी मिला ही न हो
महीने साल खामोश वीरानी में
गुज़रते रहते गुज़रते रहते…
900 मील का कोई फासला नहीं होता
और भी होंगे कई अनलिखे फासले
जो तय नहीं हुए
चल पड़ते तो सब फासले अपने आप तय हो जाते
चाहत में तो हज़ारों मील चुपचाप पार हो जाते हैं…
वक़्त के साथ
वो कविता से बेहतरीन कविता तक पहुँच गई
और वो भी नज़्म से बेहतरीन नज़्म तक पहुँच गया
पर वह ज़िंदगी तक नहीं पहुँचे
पहुँच जाते तो दोनों की ज़िंदगी
कविता कविता हो जाती, नज़्म-नज़्म हो जाती…
(लेख : शुभगौरी)
एक बहुत ही खूबसूरत लेख । ये तुम ही लिख सकती हो गौरी, शानदार अभिव्यक्ति।
अमृता जी को पढ़ना अपने आप में प्रेम से जुड़ने जैसा है ।
इमरोज़ का रोज गुलाब लाना और किताबों को सहेज कर रखना, कमरे को व्यवस्थित करना प्रेम के सच्चे रूप को दर्शाता है ।
पढ़कर बहुत अच्छा लगा ❣️
शुक्रिया साझा करने के लिए ❣️
सचिन पर्वाना