हंस हंसिनी प्रेम संवाद
जल पर छाया चंद्रमा का प्रकाश, शिव हिमालय की शिला पर ध्यानमग्न हैं। पास ही पार्वती मुख पर शांत मुस्कान लिए बैठी हैं। दूर एक सुंदर निर्मल सरोवर में हंस और हंसिनी तैर रहे हैं
हंसिनी (हंस से): प्रिय, क्या प्रेम भी व्रत हो सकता है? जैसे पार्वती ने किया था.. अपने महादेव के लिए..
हंस ( मुस्कुराकर): हाँ , जब प्रेम मौन हो जाए , तब वह तप बन जाता है। और जब प्रतीक्षा सदी बन जाए ,तब वह पार्वती हो जाती है।
पार्वती (शिव से): स्वामी, मेरे प्रेम ने आपको खींचा, या मेरी तपस्या ने?
शिव (पार्वती से): पार्वती , प्रेम और तपस्या में भेद कहाँ! जब प्रेम परम भाव बन जाए , तो वह स्वयं तप बन जाता है। और जब तप सच्चा हो.. तो वह प्रेम बन जाता है।

हंस (पार्वती की ओर देखकर): आपका प्रेम .. मेरी हंसिनी की आँखों में भी दिखता है। वह भी पूछती है, कब मिलेंगे? कब समझेंगे?
हंसिनी (शिव से): हे शिव , क्या प्रेम में त्याग भी होता है?
शिव (हल्की मुस्कान के साथ): प्रेम में केवल त्याग ही होता है, और कुछ नहीं। जब तुम अपने पंख छोड़ सकोगी, तब उड़ सकोगी मेरे साथ अनंत ब्रह्मांड में।
पार्वती (हंस से): और जब तुम अपना अहं छोड़ देते हो .. तब हंस और शिव एक हो जाते हैं। प्रकृति और पुरुष .. सदा के लिए ।
हंस और हंसिनी चाँद के उजास में लिपटे, शिव-पार्वती के प्रेम की परछाई ही तो हैं । __________________________________
“प्रेम — जब देह से परे हो जाए, तो वह शिव हो जाता है ।

“जहाँ मौन बोलता है, वहाँ प्रेम शिव होता है। जहाँ तप मुस्कुराता है, वहाँ शक्ति पार्वती होती है। और जहाँ आत्मा ठहरती है, वहाँ एक हंस साक्षी बन जाता है।
यह प्रेम नहीं, यह परम है। शिव और पार्वती — तप, ध्यान, और अनंत समर्पण का संगम।”
— शुभगौरी