आत्मा के गलियारे
आत्मा को मैंने कभी कोई दिव्य, चमकदार चीज़ नहीं समझा।
मेरे लिए वह एक पुराना, अधबना मकान है —
जिसमें कई गलियारे हैं,
कुछ खुले, कुछ बंद,
और कुछ जिनमें अब भी जाने की हिम्मत नहीं होती।
इन गलियारों में चलना
अपने ही भीतर किसी भूल–भुलैया से गुज़रने जैसा है।
हर मोड़ पर कोई पुरानी गंध,
कोई भूली हुई बात,
या किसी और के कहे हुए शब्द
जो अब मेरे हो चुके हैं।

कभी–कभी लगता है आत्मा कोई प्रकाश नहीं,
बल्कि एक छाया है —
जो हर जगह साथ चलती है,
पर जब मुड़कर देखो तो
सिर्फ एक खालीपन दिखता है।
इन गलियारों में मैं अपने कई रूपों से मिलती हूँ —
एक छोटी लड़की जो अब भी अपने पसंदीदा खिलौने के टूटने पर रो रही है,
एक युवती जो हर चीज़ को समझने की कोशिशों में थक गई है,
एक स्त्री जो अब किसी भी उत्तर की भूखी नहीं —
वो बस ख़ामोशी से गलियों में चल रही है।
आत्मा की दीवारों पर समय की परतें चिपकी हैं —
कुछ धूल की तरह,
कुछ जैसे फफूँद।
और उनमें से हर एक परत
मुझे उस जीवन की याद दिलाती है
जो मैंने जिया नहीं,
सिर्फ महसूस किया।
पर यही तो आत्म–दर्शन है ना —
जीवन को जीने से अधिक अनुभव करना।
और फिर उस अनुभूति को
अपने “आप” में बदलते हुए देखना ।
लेखक ~ शुभगौरी