स्मृति का बासीपन
हर स्मृति जब लौटती है,
तो वह वैसी नहीं होती जैसी वह थी।
वह कुछ और हो जाती है —
थोड़ी धुंधली, थोड़ी भारी,
और उसमें एक अजीब–सी गंध होती है —
बासी हवा की,
जैसे किसी बंद कमरे में बहुत देर से कोई साँस ले रहा हो।
स्मृति की यह गंध बहुत धीमे, बहुत गहरे,
देह में पैठती है।

कभी किसी पुरानी चीज़ को खोलो
कोई रुमाल, कोई पुराना खत, या किसी का स्पर्श
तो उसमें सिर्फ बीता हुआ समय नहीं होता,
बल्कि उसमें वह सब भी होता है
जो हमने भूल जाना चाहा था।
और यही बासीपन है —
वह चीज़ें जो ताज़ी थीं,
जो एक समय पर जी गई थीं,
अब वे बस रह गई हैं —
कहीं तहों में,
कहीं पुराने काग़ज़ों की सलवटों में।
मैंने अनुभव किया है कि स्मृति भी जीती है —
अपने ढंग से।
वह देह में ही कहीं बस जाती है —
कभी गर्दन में जकड़न बनकर,
कभी आँखों के भीतर थकान,
कभी नींद में कोई अस्पष्ट चेहरा।
लेकिन सबसे ज़्यादा वह तब सामने आती है,
जब हम सबसे शांत होते हैं।
जैसे दोपहर की नींद में,
या खिड़की से ढलती धूप को निहारती साँझ में,
या चाय के प्याले के अंतिम घूँट में,
जब जीवन के सारे काम थम जाते हैं,
और हम कुछ नहीं होते —
वहीं स्मृति सबसे मुखर होती है।
वह कुछ बोलती नहीं है।
वह बस अपने बासीपन से हमारे भीतर एक स्वाद छोड़ जाती है —
कड़वा नहीं,
मगर ताज़गी से बहुत दूर।
शायद यही वजह है कि मैं कभी–कभी
किसी चीज़ को दोबारा छूने से डरती हूँ —
किसी जगह को, किसी शब्द को, किसी व्यक्ति को।
क्योंकि स्मृति जब लौटती है,
तो वह सिर्फ लौटती नहीं —
वह भीतर कुछ सड़ा भी जाती है।
जहाँ आत्मा किसी मकान की तरह प्रतीत होती है —
जिसके हर कमरे में कोई बीती आहट है,
कोई धूल भरी खिड़की,
और बहुत–बहुत सन्नाटा।
लेखक ~ शुभ गौरी