मृत्यु के बाद का जीवन
मृत्यु के बाद जीवन कैसा होता है — यह प्रश्न कभी किसी संत ने मुझसे नहीं पूछा, बल्कि निर्मल वर्मा के किसी वाक्य ने मुझमें उगाया।
उनकी लिखी पंक्तियाँ जब मन के किसी अज्ञात गलियारे में प्रवेश करती हैं, तो वहाँ न प्रकाश होता है, न अंधकार — बस एक सिहरन होती है, जो जीवन के सबसे नर्म और सबसे सड़े हुए अनुभवों को एक साथ जगा देती है।
मैंने वहाँ जीवन नहीं देखा — वहाँ वह दिखा जो जीवन के तुरंत बाद होता है, जब देह मिट्टी हो जाती है, लेकिन आत्मा अब भी कमरे में टंगी धूप को महसूस करती है।
कमरे की हवा सीली होती है, खिड़की अधखुली, पर्दा हिलता है —
कोई नहीं आता, लेकिन कोई गया भी नहीं।
यही वह क्षण है जो निर्मल की भाषा में ठहरा रहता है —
एक थकी हुई आत्मा का इंतज़ार।
मुझे लगता है कि मृत्यु के बाद जीवन कुछ वैसा ही होता होगा —
न कोई आवाज़, न कोई पुकार।
सिर्फ एक पृष्ठ जो पलटा नहीं गया,
एक खिड़की जो पूरी तरह खुली नहीं,
एक गंध जो स्थिर हो गई है — मलीन देह की, जिसे हम भूलना चाहते हैं लेकिन वह छूटती नहीं।

मैंने कई बार अपने सपनों में वह दृश्य देखा है —
एक नदी बह रही है, बहुत गहरी, बहुत धीमी —
उसका रंग कोई नहीं बता सकता, क्योंकि उसमें हर रंग डूब चुका है —
और ऊपर तैर रहे हैं मन के सड़े हुए अवशेष —
सूखे पत्ते, चिड़ियों के टूटे पंख,
किसी भूले हुए रिश्ते की उँगलियाँ।
मैं उस नदी के पास बैठी हूँ —
मुझे लगता है मैं मर चुकी हूँ, लेकिन पूरी तरह नहीं।
कुछ शेष है, शायद स्मृति, शायद पश्चाताप, या शायद सिर्फ ठहराव।
और तभी मैं निर्मल को पढ़ती हूँ —
और वह मेरे भीतर वह सब कह जाते हैं जिसे मैं खुद से भी नहीं कह पाती।
लेखक – **~ शुभगौरी**