ईज़ाडोरा डंकन की आत्मकथा पढ़ते वक़्त जो एक बात मुझे सबसे ज़्यादा पसंद आई वो थी ईज़ाडोरा का बेबाक उन्मुक्त व्यक्तिव,
उसकी नज़र में उसने जीवन में कुछ ख़ास नहीं कमाया,ना वो आर्थिक रूप से मज़बूत हो पायी और ना ही प्रेम संबंधों में भाग्यशाली ..अपनी नृत्य कला के प्रति अति-संवेदनशील , समाज के उच्च वर्ग के साथ उठना बैठना, पुरुषों की स्वप्न सुंदरी, पूरी दुनिया में उसके चाहने वालो के बीच भी वो स्वयं को घोर-दुर्भाग्यशाली मानती रही ..ईश्वर अपनी प्रिय आत्मा पर मेहरबान रहा फिर भी वो आत्मा एक कमी से घिरी रही ..और वो कमी थी एक प्रबल प्रेमी की कमी जिसके साथ वो अपने कलापूर्ण जीवन को ईश्वरीय ढंग से जी पाती..
इंग्लैंड के मशहूर नृत्य समीक्षक रिचर्ड ऑस्टिन , ईज़ाडोरा डंकन की जीवन शैली और उसके विचारों की आलोचना करते रहे हैं,रिचर्ड कहते हैं कि ईज़ाडोरा एक महानतम नृत्यांगनाओं में से एक थी,और आधुनिक पश्चिमी नृत्य के विकास में उसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
“समझ नहीं आता कि इतनी मूर्ख स्त्री ऐसी महान कला का निर्माण कैसे कर लेती थी”
मैं रिचर्ड ऑस्टिन द्वारा की गई आलोचना की घोर निंदा करती हूँ,
ईज़ाडोरा ना तो मूर्ख थी और ना ही एक बोर स्त्री,वो दुनिया के रंगों में नहीं ढल पायी क्यूंकि वो अति संवेंदनशील थी, संवेदनशील अपनी कला के प्रति जिसको वो दूसरों की शर्तों के हिसाब से बदलना नहीं चाहती थी,वो उसकी ख़ुद की कला थी जिसे वो आगे की पीढ़ियों में स्थानान्तरण करने के लिए उत्साहित थी,जब वो नाचती थी तब वो ईश्वर से बातें करती थी,अपने स्त्रीत्व का जश्न मनाती थी, अपनी देह में उठती तरंगों से श्रंगारित होती थी..बहुत सादे झीने लिबास में नंगे पैर थिरकना उसे प्रकृति से जोड़े रखता था, और ईज़ाडोरा का यही सौंदर्य लोगों को पागल कर देता था,उस दौर के लेखक,कलाकार,चित्रकार सब उसके सौंदर्य को अपनी अपनी कलाकृतियों में उतारने के लिए आकुल थे और इन सबके बावज़ूद वो ख़ुद को मामूली समझती रही।

प्रेम और स्वतंत्रता की टकराहट:
किसी भी सदी की उन्मुक्त स्त्री ,जो ख़ुद को प्रेम करना जानती है,
जो किसी अन्य व्यक्ति के प्रभाव में आए बिना जीवन जीने का विचार कर लेती है वो उस सदी की महानायिका होती है। कुछ उसके प्रशंसक होते है ,कुछ उसे देवी मानते हैं,तो वहीं कुछ उसको आत्मकेंद्रित,बिगड़ैल और स्वार्थी कहते हैं..बात सिर्फ़ इच्छापूर्ति की है , समाज के जिस वर्ग को वो स्त्री समझ आ गई वो नायिका के रूप में देखते हैं और जिनको समझ नहीं आई उनके लिए वो एक बिगड़ैल स्त्री से ज़्यादा कुछ नहीं होती है,
ईज़ाडोरा पर आरोप लगे कि वो पुरुष दर पुरुष भटकती रही..उसके हृदय में किसी के लिए समर्पण था ही नहीं।
मैं समझती हूँ कि समर्पण तभी संभव है जब उसका साथी मानसिक रूप से उसका जोड़ का हो। ईज़ाडोरा एक ऊँची इंसान थी, जीवन के सहज आनंद, ऊर्ज़ा और सृजन से इतनी ज़्यादा भरपूर कि उसे अपने संपर्क में आए पुरुषों में कोई अपनी टक्कर का मिला ही नहीं , जहाँ कुछ पुरुष आज भी अपने बचपने में क़ैद थे वहीं कुछ बहुत ज़्यादा गंभीर और एकरसता के प्रतीक। दिल,दिमाग़ और आत्मा से भरी-पुरी स्त्री आख़िर किसके साथ अपना जोड़ बिठा पाती, जब कोई पूरी तरह से उसका था ही नहीं तो वो किसके प्रति समर्पित होती !
जहाँ एक का व्यक्तित्व इतना स्वतंत्र हो, वहाँ कोई उसको कैसे बाँध कर रख सकता है..वो भी तब जब उसने ये स्वीकार किया हो कि वो स्त्री हू-ब-हू उसके सपनों से बाहर आई हुई लगती है ।
गार्डेन क्रेग,जो कि ईज़ाडोरा की तारीफ़ में आधा हुआ जा रहा था ,उसकी कला का इतना बड़ा प्रशंसक था, ईज़ाडोरा के उसके प्रेम में पड़ते ही उसका रवैया मालिकाना हो गया, “तुम ये सब छोड़ क्यों नहीं देती,मंच पर जाकर अपनी बाहें इधर उधर लहराना छोड़ दो, घर पर रह कर मेरी पेंसिलों के सिक्के तेज क्यों नहीं करती।”

क्रेग ने जिस ईज़ाडोरा को रात भर निहारा था, उसकी देह की बनावट, उसके सुंदर हाथ, आँखें,पैर और नाखूनों तक को अपनी कलाकृति में स्थान दिया,जो उसका प्रेमी बनकर स्वयं को दुनिया का सबसे भाग्यशाली पुरुष समझता था ..वही क्रेग आज जीवंत कलाकृति को क़ैद करना चाहता था ..फिर भी ईज़ाडोरा ने क्रेग को प्रेम किया..
मातृत्व, प्रेम और समाज की विसंगतियाँ
ईज़ाडोरा ने कभी नहीं सोचा था कि जिस प्रेम को वो तलाश रही है उस प्रेम की परिभाषा यहाँ इस समाज में मान सम्मान का अधिकारी नहीं होता है, प्रेम के आवेश में वो ये भूल गई कि समाज एक स्त्री की पवित्रता की पूजा करता है ,उसके प्रेम संबंधों की नहीं।
अपनी माँ के वीभत्स दाम्पत्य जीवन ने ईज़ाडोरा का विश्वास शादी जैसी संस्था पर से उठा दिया था,वो विवाह करने के विचार को तभी ख़ारिज कर चुकी थी जब वो बहुत छोटी थी। लेकिन इसके साथ ही वो एक सच्ची स्त्री थी, सौंदर्य और कला से भरी-पूरी स्त्री। वो अपने स्त्रीत्व का जश्न मनाती थी, इतनी निडर थी कि उसने स्त्रीत्व और मातृत्व को किसी संस्था में बांधना प्रकृति के विरुद्ध समझा ।

ईज़ाडोरा समाज के लिए नहीं बनी थी, वो सृष्टि थी और सृष्टि का अधिकार है कि नए जीवन को अंकुरित करने का सौभाग्य प्राप्त करे।
ईज़ाडोरा ने वही किया,बिना विवाह किए मातृत्व सुख भोगने का फैसला। गार्डेन क्रेग से प्रेम संबंधों के परिणाम स्वरूप ईज़ाडोरा ने 1905 में अपनी पहली संतान को जन्म दिया,तमाम झगड़ों और मनमुटावों के बावजूद इन दोनों ने एक साथ अपनी प्रतिभाओं का भरपूर विकास किया।ईज़ाडोरा ख़ुद ये स्वीकार करती है कि क्रेग जैसे महान कलाकार को प्रेम करना उसके जीवन का सबसे सुंदर क्षण था।
ईज़ाडोरा का आख़िरी प्रेमी सर्जी एसिनिन जो कि एक कवि था और ईज़ाडोरा से उम्र में काफ़ी छोटा था, विवाह के ख़िलाफ़ अपनी दृढ़ मान्यताओं के बावजूद ईज़ाडोरा ने उससे विवाह करने का निर्णय लिया। कई आलोचकों की राय में एसिनिन ने ईज़ाडोरा डंकन से नहीं बल्कि उसकी प्रसिद्धि से विवाह किया था..जहाँ भी जाता उसको एसिनिंन-ईज़ाडोरा , ईज़ाडोरा-एसिनिन सुनना अच्छा लगता था। वहीं ईज़ाडोरा ने भी एक इंटरव्यू में ये स्वीकार कि उसने एसिनिन से विवाह इसलिए किया क्यूँकि वो अस्वस्थ था और उसको एक इलाज की ज़रूरत थी,दूसरे वो एक कवि था और ईज़ाडोरा यूरोप और अमेरिका की यात्रा के माध्यम से उसके सामने रचनात्मकता के नए क्षितिज खोलना चाहती थी, विवाह का प्रमाणपत्र एसिनिन को को अपने साथ यूरोप और अमेरिका ले जाने के लिए, रूसी सरकार की अनुमति प्राप्त करने के लिए ज़रूरी था। अपने अतिउत्साही,आत्मकेंद्रित,और ऐश्वर्यपूर्ण जीवन के तहत एसिनिन नशे में डूब गया और ज़्यादा शराब पीने की वजह से उसकी मृत्यु हो गई और एसिनिन की मृत्यु का इल्ज़ाम भी ईज़ाडोरा डंकन लगा कि ईज़ाडोरा की वजह से एसिनिन नशे में डूब गया और बर्बाद हो गया। एसिनिन की मृत्यु के बाद ईज़ाडोरा अवसाद में चली गई और बहुत समय तक इस दुख में मरती रही।

उसकी कला के प्रति श्रद्धांजलि — “अमरीका डान्सिंग ”
अट्ठारहवीं और उन्नीसवी सदी की दुनिया ने आज की दुनिया को बहुत से कलाकार,चित्रकार,लेखक,कवि और शिल्पकार दिए हैं ..उनमें से ही एक था जॉर्ज ग्रे बर्नार्ड जो एक शाम न्यूयॉर्क में ईज़ाडोरा का नृत्य देखने आया था, जॉर्ज ग्रे बर्नार्ड वही शिल्पकार था जिसकी बनायी अब्राहम लिंकन की प्रतिमा आज भी अमेरिका में लगी है।
जॉर्ज ग्रे बर्नार्ड अपने साथ चित्रकार, कवि और अन्य विशिष्ट मित्रों को लाया जिनमे रॉबर्ट हेनरी,जॉर्ज़ बेलोस,पर्सी मके,मैक्स ईस्टमेंन,रिजले , विलियम और टोरेस भी थे ..ये सभी आज अमेरिकन इतिहास में बहुत बड़ी पहचान रखते हैं।
जॉर्ज ग्रे बर्नार्ड ईज़ाडोरा के नृत्य की पहली झलक देखते ही उस पर मुग्घ हो गया और नृत्य मुद्रा में उसकी मूर्ति बनाने का विचार रखा। उसने उस मूर्ति का नाम “अमरिका डांसिग” रखा।
ईज़ाडोरा डंकन का अंत जितना नाटकीय था, उतना ही विलक्षण और करुणामय ,जैसे किसी त्रासदी में ढली कविता का अंतिम बंध..
अपने जीवन में उसने प्रेम को पूजा का भाव दिया, कला को आत्मा का धर्म माना,और स्वतंत्रता को अपनी साँसों में बसा लिय.. लेकिन अंत में ना तो प्रेम पूरी तरह से मिला, और ना ही समाज ने उसकी आत्मा को समझा।

मृत्यु का उत्सव :ईज़ाडोरा डंकन सिंड्रोम
ईज़ाडोरा डंकन अपनी मृत्यु में भी नाटकीय, नृत्यमयी और अपने स्त्रीत्व का उत्सव मनाती एक स्वतंत्र नायिका रही , उसकी मृत्यु भी उसकी कला का एक अद्भुत प्रदर्शन ही रही ..हवा में लहराती सुंदर पंखों वाली मृत्यु ।
1927 में, फ्रांस के नीस शहर की एक सड़क पर, एक कार में बैठते हुए वो तो ये भी नहीं जानती थी कि उसका पसंदीदा लाल रेशमी स्कार्फ ,जो उसकी आत्मा की तरह स्वतंत्र था , कार के पहिए में उलझ जाएगा.. और उसका अंत बन जाएगा।
उसका गला उसी दुपट्टे से घुट गया, जो उसके सौंदर्य और नृत्य की पहचान था।
कैसी विडंबना थी ,

जिस स्कार्फ ने उसके शरीर को कला की तरह छुआ था, उसी ने उसकी देह को एक कभी भी ना भंग हो सकने वाली शांति दी..
जिस स्वतंत्रता को उसने पहन लिया था, वही उसका अंतिम वस्त्र बन गई।
और इस तरह ईज़ाडोरा डंकन जो जीवनभर अपने सपनों में नाचती रही, एक अंतिम अनजाने नृत्य में विलुप्त होकर अमर हो गई।
उसकी मृत्यु भी अपना नाम कर गई ..मोटर के पहिए में स्कार्फ के उलझ जाने और गला घुट कर मर जाने को इंगलिश डिक्शनरी में स्थान मिला ..और उसे कहा गया —“ईज़ाडोरा डंकन सिंड्रोम”
ईज़ाडोरा डंकन
-शुभगौरी
आत्मा का संगीत इतना अधिक विशुद्ध होता है कि उसकी धुन पर प्रकृति भी थिरक उठती है ..
ईज़ाडोरा का नृत्य आत्मा के संगीत को छेड़ता था ..और ईज़ाडोरा स्वयं प्रकृति बन कर उस संगीत पर थिरकती थी ।