भाग 5 : निर्मल और मैं

आत्मा के गलियारे आत्मा को मैंने कभी कोई दिव्य, चमकदार चीज़ नहीं समझा। मेरे लिए वह एक पुराना, अधबना मकान है — जिसमें कई गलियारे हैं, कुछ खुले, कुछ बंद, और कुछ जिनमें अब भी जाने की हिम्मत नहीं होती। इन गलियारों में चलना अपने ही भीतर किसी भूल–भुलैया से गुज़रने जैसा है। हर मोड़ […]
भाग 4 : निर्मल और मैं

स्मृति का बासीपन हर स्मृति जब लौटती है, तो वह वैसी नहीं होती जैसी वह थी। वह कुछ और हो जाती है — थोड़ी धुंधली, थोड़ी भारी, और उसमें एक अजीब–सी गंध होती है — बासी हवा की, जैसे किसी बंद कमरे में बहुत देर से कोई साँस ले रहा हो। स्मृति की यह गंध […]
भाग 3 : निर्मल और मैं

ठहराव की नदी कुछ नदियाँ बहती नहीं हैं — वे ठहर जाती हैं, पर ठहर कर भी बहती रहती हैं — धीरे, गहरे, चुपचाप। उन्हें देखने से यह भ्रम होता है कि वे थमी हैं, पर उनके भीतर जो चल रहा है, वह सतह से बहुत नीचे, बहुत अंतर में बहता है। मन भी ऐसी […]
भाग 2: निर्मल और मैं

चेतना का भार देह जब भारी लगने लगे, तब सबसे पहले मन उस भार को पहचानता है — पर ये भार क्या सचमुच शरीर का होता है? या चेतना का? एक दोपहर सुस्त कमरे में स्वयं को सुलाने के प्रयास में, मैंने देखा कि नींद इतनी बोझिल भी हो सकती है — कमरे में दीवारें […]
भाग 1 : “निर्मल और मैं”

मृत्यु के बाद का जीवन मृत्यु के बाद जीवन कैसा होता है — यह प्रश्न कभी किसी संत ने मुझसे नहीं पूछा, बल्कि निर्मल वर्मा के किसी वाक्य ने मुझमें उगाया। उनकी लिखी पंक्तियाँ जब मन के किसी अज्ञात गलियारे में प्रवेश करती हैं, तो वहाँ न प्रकाश होता है, न अंधकार — बस एक […]
जन्मदिन विशेष: तुम्हें पढ़ना साँस लेने जितना ही सहज है अमृता

प्रिय अमृता!जन्मदिन की शुभकामनाएँतुम्हारी “रसीदी टिकट” पढ़ रही हूँ,इसके पहले मैंने तुम्हारी “मैं तुम्हें फिर मिलूँगी” पढ़ी थी। वो भी इसलिए क्युँकि मेरी एक रचना पर किसी ने लिखा था “ये तो बिल्कुल अमृता प्रीतम जैसा लिखा है “और इस तरह से दो साल पहले मैंने तुम्हे पहली बार पढ़ा।मैं हमेशा कहती हूँ कि लिखना […]
अमृता : जो किताब के आख़िरी पन्ने पर आज भी ज़िंदा है

“वो अभी भी मेरे कमरे में है ,मेरे बगल में बैठती है ,और मैं उसे हर शाम एक गुलाब देता हूँ।”- इमरोज (लेख : शुभगौरी) कुछ दिनों पहले एक किताब पढ़ रही थी , वो किताब कम और रंगों से भरा एक कैनवास ज़्यादा लग रहा था । उसमे लिखे शब्द कोई कविता नहीं रच […]
मनुष्य की सोलह अशुद्धियाँ और आत्मा की शुद्धि

हमे ये तो मालूम ही है कि हम सब इस जीवन रूपी यात्रा में निरन्तर आगे बढ़ रहे हैं।परंतु क्या आपने कभी सोचा है कि वो कौन-सी चीज़ है, जो हमें ,हमारे स्वरूप, हमारे सत्य, हमारे ईश्वर से दूर करती है? वो है कार्मिक अशुद्धियाँमनुष्य के भीतर सोलह प्रकार की अशुद्धियाँ होती हैं —जो उसकी […]
The Acceleration of Time

After the pandemic, many have reported:• A blurred sense of time (days feel long, years feel short).• Reduced ability to remember events or details (what happened in 2021? 2022? 2023 ?it all feels foggy).• A strange feeling of dislocation, as though reality “shifted” slightly. This isn’t just emotional; it’s neurological and cultural:• The pandemic disrupted […]
शिव बटालवी: जो प्रेम को जीते रहे और दुनिया उनकी तड़प को चुप कराती रही

जब कोई सितारा टूट कर गिरता है तो लोग कहते हैं कि हमे उससे विश माँगनी चाहिए ..कोई पवित्र आत्मा कम उम्र में देह छोड़ गई होगी.. कम उम्र में देह छोड़ जाने वालो की वहाँ ऊपर भी एक अलग दुनिया होती होगी जहाँ वो अपनी अधूरी यात्रा के किस्से एक दूसरे से साझा करते […]