प्रिय अमृता!
जन्मदिन की शुभकामनाएँ
तुम्हारी “रसीदी टिकट” पढ़ रही हूँ,
इसके पहले मैंने तुम्हारी “मैं तुम्हें फिर मिलूँगी” पढ़ी थी। वो भी इसलिए क्युँकि मेरी एक रचना पर किसी ने लिखा था “ये तो बिल्कुल अमृता प्रीतम जैसा लिखा है “
और इस तरह से दो साल पहले मैंने तुम्हे पहली बार पढ़ा।
मैं हमेशा कहती हूँ कि लिखना साँस लेने जितना ही सहज होना चाहिए.. बिना किसी बनावटी शब्द के..
तुम्हें पढ़ने के बाद महसूस हुआ कि किसी को पढ़ना भी साँस लेने जितना ही सहज हो सकता है..
तुम्हारे शब्द जीते हैं,साँस लेते हैं.. तुम्हारी लिखी किताबों में।
तुमने मुझे बताया कि तुम्हारा सोलहवाँ बरस वैसा नहीं आया जैसा बाकी लड़कियों का आता है..क्युँकि तुम्हारी माँ नहीं थीं।
वो आता था जब तुम्हारे पिता जी सो जाया करते थे..
कभी खिड़की से तो कभी दिवार को फाँद कर.. और तुम घंटों उसे शीशे में निहारा करती थीं ।
तुम किसी ऋषि की तरह समाधी में लीन थीं और तुम्हारा सोलहवाँ बरस इंद्र की कोई साज़िश, जो तुम्हारी बचपन की समाधी को तोड़ने आया था..
तब तुमने इश्क़ पर ना जाने कितनी ही नज़्मे लिखीं और अपने पिता की अच्छी बेटी बने रहने के लिए उन्हें फाड़ दीं।
उस सोलहवें बरस में ही तुम्हारा ब्याह प्रीतम से कर दिया गया और फिर कुछ ही सालों में तुमने दो संतानों को जन्म दिया. लेकिन उसी दौरान तुम अपनी कविताओं की चुनरी ओढ़े अपने इश्क़ से मिलीं ,
ये ज़हनी इश्क़ कहाँ किसी को समझ आने वाला था..
ना तब और ना ही आज।

लिखने का जुनूँ था तुम पर और समाज तुमसे गृहस्थी चाहता था,
तब तुमने इस समाज को पहली बार आईना दिखाया था, और अपने दोनो बच्चों को लेकर दिल्ली चली गयीं।
तुम्हारे लेखन में इतना ज़ादू था कि कोई भी उससे अछूता नहीं रहा.. बहुत से लोगों को तुममें अपना इश्क़ दिखता और तुम बहुत ही सहजता से ये कह देती कि तुम्हें सिर्फ़ एक शख्स से इश्क़ है, वही शख्स जिसे तुम लिखा करती थीं।

मैं सोचती हूँ कि क्या सच में तुम्हें किसी से इश्क़ था! या कि तुम इश्क़ लिखती रहो इसलिए किसी से इश्क़ किया! मुझे ज़वाब मिलता है कि तुम्हें लिखने से इश्क़ था.. बेशक़ तुम्हें लिखने से ही इश्क़ था.. इसलिए तुमने सिर्फ़ लिखने के लिए ही बगावत की। वरना किसी अप्सरा को कितनी देर लगती है किसी तपस्वी की तपस्या भँग करने में!
ख़ैर!!
मैं तुम्हें पढ़ रही हूँ.. और महसूस कर रही हूँ कि तुम्हारी कविताएँ सच में किसी नाज़ायज़ संतान की तरह रही होंगी.. जिन्हे समाज ने हमेशा शक की नज़र से देखा..
जब तुम पंजाब वापस आयीं तो तुमने बताया कि अख़बारों में तुम्हारे बारे में क्या क्या छपा करता था.. बुरी से बुरी बातें तुम्हारे बारे में छापी जा रही थीं।
और तुम्हें उन बातों से कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा था।
और फिर एक दौर ऐसा भी आया कि तुम तमान लड़कियों के सिरहाने मिलने लगीं.. अपनी किताबों के रूप में और तब तुम एक मात्र ऐसी लेखिका थीं जिनको विदेशों में भी सम्मान मिलने लगा।

तुम्हें पढ़ कर भावनाओं का इंकलाब होना लाज़मी है,
ग्रहस्थ जीवन में प्रीतम के बच्चे का तुम्हारी कोख में होना और तुम्हारा साहिर को सोचना सिर्फ़ इसलिए कि तुम्हारे होने वाले बच्चे की शक्ल साहिर सी हो.. ये इंकलाब ही तो है.. और तुम्हारी कल्पना का ज़ादू भी।
एक बंधन से ख़ुद को मुक्त कर देना,
और फिर ख़ुद के साथ को जीने लिए चुनना,
और बिना ब्याह के अपनी सारी उम्र इमरोज़ के साथ बिता देना।

तुम आज से सौ साल पहले भी इतनी बहादुर थीं जितनी कि आज की औरतें भी नहीं हैं, और समाज में प्रेम को स्वीकारने की तब भी कमी थी और आज भी है।
फिर भी इस कमज़ोर समाज में तुम तीन पुरुषों को अमर कर गयीं –
अपने नाम से प्रीतम सदा के लिए जोड़कर प्रीतम को..
अपनी किताबों में साहिर लिख कर साहिर को..
और अपनी किताबों के आवरण को इमरोज़ के रंगों को से सजा कर इमरोज़ को।
लेखक ~शुभगौरी