हमे ये तो मालूम ही है कि हम सब इस जीवन रूपी यात्रा में निरन्तर आगे बढ़ रहे हैं।
परंतु क्या आपने कभी सोचा है
कि वो कौन-सी चीज़ है, जो हमें ,हमारे स्वरूप, हमारे सत्य, हमारे ईश्वर से दूर करती है?
वो है कार्मिक अशुद्धियाँ
मनुष्य के भीतर सोलह प्रकार की अशुद्धियाँ होती हैं —
जो उसकी आत्मिक चेतना पर आवरण की तरह हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई काला बादल सूर्य को ढक लेता हैं।
सूर्य वहीं होता है , परंतु एक काले आवरण में ढका हुआ ..
ठीक ऐसे ही मनुष्य की ये कार्मिक अशुद्धियाँ आत्मा पर आवरण चढ़ा देती हैं ..
इन अशुद्धियों में पहली अशुद्धि है काम (वासना)
जब हम इन्द्रियों के पीछे भागते हैं,
तब आत्मा की शांति खो जाती है।
वासना की आग कभी बुझती नहीं,
और मन को निरंतर जलाती चली जाती है।
फिर आता है – क्रोध
क्रोध हमें भीतर तक जला देता है।
वह निर्णय क्षमता को नष्ट करता है, और प्रेम को खा जाता है।
क्रोध में बोला गया एक-एक वाक्य, कई जन्मों का संबंध तोड़ सकता है।

लोभ, मोह, अहंकार…
ये सब हमारे मन के उस दर्पण पर धूल हैं —
जिसमें ईश्वर का प्रतिबिंब दिखाई देना चाहिए था।
ईर्ष्या और द्वेष —
दूसरे की प्रसन्नता से दुखी होना..
ये हमारी आत्मा को कलुषित कर देता है।
जब तक हम औरों की सफलता में आनंद नहीं ले सकते, हम अपने जीवन में भी कभी पूर्ण नहीं हो सकते।
फिर है अज्ञानता —
जब हमें अपने स्वरूप का बोध नहीं होता,
हम शरीर को आत्मा, और माया को सत्य मान बैठते हैं। और इसी मायाजाल में उलझ कर रह जाते हैं ..अज्ञानी और ईश्वर विमुख होकर ।
इन सोलह अशुद्धियों को दूर करने का उपाय क्या है?
ध्यान – जिससे मन स्थिर हो।
सत्संग/ स्व संग– जिससे ज्ञान जाग्रत होता है ।
सेवा – जिससे अहंकार का विनाश होता है।
प्रेम – जो सबसे बड़ा शुद्धि-कारी भाव है।
प्रेम आत्मा का प्यूरीफायर है जो कि उसको निर्मल कर देता है ।
जब मनुष्य इन दोषों को पहचानता है,
और एक-एक करके उन्हें स्वच्छ करता है,
तब वह अपने प्रकाश स्वरूप को पहचानने लगता है।
तुम्हें समझना होगा कि,
तुम स्वयं में ही पूर्ण हो।
तुम्हें किसी बाहरी साधन की आवश्यकता नहीं है —केवल इन सोलह पर्दों को हटाने की आवश्यकता है।
और जब ये परदे हटते हैं —
तब आत्मा तृप्ति के गीत गाती है,
तब भीतर शांति उतरती है,
तब ईश्वर प्रकट होता है…
तुम्हारे भीतर।
-शुभगौरी