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लोबान : हिंदी काव्य संग्रह

लोबान सा महकता प्रेम

समंदर का शोर उस शोर से कम था जो मेरे मन में हो रहा था उँगलियों से तुम्हारे हाथों को छू जाना मुझे अपराधिनी बना रहा था अपराधिनी! तुम्हारा ध्यान भंग करने की, अपराधिनी ! तुम्हें गहरी नींद से जगा देने की, अपराधिनी! वो सवाल पूछने की जिसका जवाब तुम्हारे पास नहीं… अच्छा सुनो, प्रेम तो अपराध नहीं!

लेखक: शुभ गौरी

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